बिजलियाँ दिल पे निगाहों से गिराया न करो

बे-हिजाबाना कभी बाम पे आया न करो

मिल गई आँख से जब आँख तो कुछ बोल भी लो
तुम जो ख़ामोश हो ये ज़ुल्म है, ढाया न करो

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से महकी है मोहब्बत की फ़ज़ा
ख़ुश्बू-ए-गुल को तुम आँचल में छुपाया न करो

आह से उन की हुकूमत न पलट जाए कहीं
हुक्मराँ हो के फ़क़ीरों को सताया न करो

यूँ जो तुम देखते हो चाँद को, ये ठीक नहीं
जगमगाते हुए तारों को जलाया न करो

सुन के बादल के गरजने की सदा तुम 'मुश्ताक़'
अपने अंदर कोई तूफ़ान जगाया न करो

— Saqlain Mushtaque

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Zulm Shayari

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