चेहरा तुम्हारा आज तलक चश्म-ए-तर में है
यानी मकीन हुस्न ये पानी के घर में है
जिस रोज़ से रखा है क़दम काएनात में
तब से ये ज़िंदगानी मुसलसल सफ़र में है
होंठों से चूमों दस्त-ए-अदब उनके दोस्तों
सहरा की ख़ाक जितने जवानों के सर में है
अशआर मेरे दर्द में डूबे हैं इसलिए
मंज़र वो क़ैद आज भी मेरी नज़र में है
जितनी कशिश है इस रुख़-ए-अनवर में जान-ए-जाँ
इतनी कशिश भला कहाँ शम्स-ओ-क़मर में हैं
इक अरसा हो गया तुम्हें घर छोड़ कर गए
लर्ज़ां मगर अभी भी याँ दीवार-ओ-दर में है
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