"सल्तनत"
मैं जैसा आज हूँ वैसा नहीं था माज़ी में
मैं बादशाह था छोटी सी सल्तनत थी मेरी
जहाँ पे कोह शजर आबशार गुलशन थे
जहाँ शजर पे सदा फूल कलियाँ खिलती थीं
हमेशा आन के गुलशन में फूल कलियों का
तमाम तितलियाँ भँवरे तवाफ़ करते थे
यूँ सुब्ह शाम का मंज़र हसीन लगता था
मगर मलाल ज़माने के इक सितमगर ने
मुझी से छीन ली लम्हों में सल्तनत मेरी
— Shajar Abbas















