कहानी 'इश्क़ की अपनी सुना के पछताए
अमीर ज़ादी से हम दिल लगा के पछताए
तमाम 'उम्र जिसे चाहा टूटकर हमने
ये बात उससे छुपाई छुपा के पछताए
हमारे दिल पे हमारा अब इख़्तियार नहीं
निगाह उनकी नज़र से मिला के पछताए
हमारे दस्त-ए-हुनर कर दिए क़लम यारों
ग़ज़ब है ताजमहल को बना के पछताए
तुम्हारी याद में रोना नहीं था हमको कभी
तुम्हारी याद में आँसू बहा के पछताए
पलट के पीछे ना देखोगे था यक़ीन हमें
सदा लगाई तुम्हें और लगा के पछताए
जहाँ पे मिलते थे हर शाम एक दूजे से हम
तुम्हारे बाद वहाँ जान जा के पछताए
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