ज़ालिमों से भरी ज़िंदगी है तो है
दर्द है ज़ख़्म है बेबसी है तो है
सब तो हैं पास मेरे मगर क्या करूँ
माँ बिना ज़िंदगी में कमी है तो है
एक घर में सभी के ख़ुशी के लिए
भागता सिर्फ़ इक आदमी है तो है
मौत से भागकर जाओगे तुम कहाँ
मौत का ही सफ़र आख़िरी है तो है
ये ग़ज़ल ख़ुद महकने लगेगी यहाँ
गंध "चंदन" की अब फैलती है तो है
— Manoj Sharma "Chandan"















