अपने बच्चो की तुझ को मैं जन्नत सखी

मैं बना लूँ तुझे अपनी उलफ़त सखी

मेरी चाहत है बेटी हो इक मुझ को भी
और हो तेरी तरह जिस की सूरत सखी

इस लिए भी वो मुझ से है ग़ुस्सा बहुत
दोस्तों में, मेरी इक है औरत सखी

तू ही कहती थी अपनी मोहब्बत है सच
अब तू ही कर रही है बग़ावत सखी

बे-वफ़ाई की जिस ने करेगा वो फिर
छूट सकती नहीं ये वो आदत सखी

इक परी लड़की का मैं ने दिल तोड़ा है
मैं नहीं कर सका हूँ मोहब्बत सखी

पेड़ जो सीधे होते, वो काटे हैं लोग
छोड़ दूँगा मैं भी अब शराफ़त सखी

है नहीं मिलता जल्दी किसी से 'सलीम'
चाहे तुझ को, ये उस की इनायत सखी

— BR SUDHAKAR

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Gussa Shayari

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