चमक में शहर की ग्वालिन नज़र नहीं आती

वो आती तो है मगर उस क़दर नहीं आती

थपेड़ से ही ग़रीबी के वो उधर आते
है लौटने की जिधर से ख़बर नहीं आती

ख़फ़ा है शख़्स अगर तो उसे मना लो तुम
क़ज़ा किसी को कभी बोलकर नहीं आती

न छाती ये किसी बच्चे में भी ग़म-ए-हस्ती
हवा में फर्ज़ की इल्लत अगर नहीं आती

ख़लिश झलक रही इंसान की ज़बाँ पर बस
है गुफ़्तगू सभी से पर नज़र नहीं आती

पता चला हमें तब दर-ब-दर पे भटके जब
कि माँगने की समझ दर-ब-दर नहीं आती

कभी न निकली सहर में जो तान्या घर से
वो फर्ज़ के तले अब जल्दी घर नहीं आती

— Tanya gupta

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