कभी ऐसा भी हो ये दूरियाँ इतनी सिमट जाए
घटाओं से निकल कर चाँद धरती से लिपट जाए
मिलन की आस ने अबतक मुझे मरने से है रोका
जुदा साँसें हो जाए तन से या फिर हिज्र कट जाए
तुम्हें भाता है खिड़की से फिसलती बूंद को तकना
दुआ करती है टूटी छत कि ये बारिश निबट जाए
पिताजी से है ली ता'लीम बातों का मैं हूँ पक्का
मेरी फितरत नहीं ऐसी जो वादों से पलट जाए
— Sachin kumar















