बढ़ते-बढ़ते रोज़ तन्हाई जो बढ़ती जा रही है
बस गिला है ये हमें नाकामियाँ तड़पा रही है
ये जहाँ से है शुरू आ कर वहीं पे रोज़ मिलना
ज़िंदगी भी थक चुकी ऐसे ही बीती जा रही है
ख़्वाब सारे मर चुके हैं ग़म भी शायद अब नहीं हैं
क्या बचा मुझ
में फ़क़त अब नींद अच्छी आ रही है
क्या कहें किस मोड़ से किस मोड़ तक हम को ये लाई
ज़िंदगी बेज़ार थी बेकार होती जा रही है
— Umashankar Lekhwar















