मेरी पलकों पे बारिश हो रही है
गिरी हर बूँद आँखें धो रही है
गुलाब आँखों में चुभने से लगे हैं
मेरी काँटों से यारी हो रही है
है नींद आँखों से भी ओझल कहीं पर
मेरी फ़ुर्क़त में बैठी रो रही है
नहीं आती है ख़्वाबों में मेरे अब
तो शायद फिर वो जल्दी सो रही है
मैं चाहत की निशानी खो रहा हूँ
मेरी उम्मीद रस्ता खो रही है
नहीं अब ढूँडता उस को कहीं पर
मेरे ख़्वाबों में अक्सर जो रही है
हथेली पर रखा है ज़हर उस की
मेरी ही ज़िंदगी में बो रही है
न जाने क्यूँ ये अब करवट बदल ली
नहीं करनी जो बात अब हो रही है
— Umashankar Lekhwar















