वहाँ पे बैठ के मुझ को तेरी हाँ याद आई थी
तुझे देखा जहाँ तू देख कर के मुस्कुराई थी
तुझे तो याद होगा भी नहीं पर बैठ के मैं ने
वही है दिन जिया जब हम मिले नज़रें मिलाई थी
मुझे वो कोसती है आज भी वो रूठ जाती है
सिमट जो रात ख़्वाबों में तेरे मैं ने बिताई थी
नहीं थी तू वहाँ पर देख कर मैं ख़्वाब बुन आया
वहाँ था बंद दरवाज़ा मुझे इक याद आई थी
दिखी तू क्यूँ रुका मैं क्यूँ सभी कुछ पूछ आया हूँ
उसी घर से जहाँ पहली दफ़ा तू मुस्कुराई थी
— Umashankar Lekhwar















