बे-ख़याली में हम भी कहाँ आ गए
छोड़ पीछे तुम्हारे जहाँ आ गए
अब बुलाना नहीं याद आना नहीं
फ़ासले अब बहुत दरमियाँ आ गए
अब कोई आरज़ू या गुज़ारिश नहीं
मोल इस का नहीं हम कहाँ आ गए
जिस्म की हद के बाहर निकल कर जहाँ
रूह रौशन हुई हम वहाँ आ गए
— Gulshan
छोड़ पीछे तुम्हारे जहाँ आ गए
अब बुलाना नहीं याद आना नहीं
फ़ासले अब बहुत दरमियाँ आ गए
अब कोई आरज़ू या गुज़ारिश नहीं
मोल इस का नहीं हम कहाँ आ गए
जिस्म की हद के बाहर निकल कर जहाँ
रूह रौशन हुई हम वहाँ आ गए
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