अगन में जुदाई की जलते हुए
कटी रात करवट बदलते हुए
पता मंज़िलों का उन्हीं को मिला
चले जो भी गिरते सँभलते हुए
मिला ठोकरों के सिवा और क्या
सदाक़त की राहों पे चलते हुए
जो आया है उस का है जाना अटल
ये कह कर गया सूर्य ढलते हुए
कठिन इतनी होगी जहाँ की डगर
न सोचा था घर से निकलते हुए
तक़ाज़ा समय का जो समझे नहीं
रहे हाथ 'गुलशन' वो मलते हुए
— Gulshan















