अजब दुख है हमारी ज़िंदगी का मसअला ये है
तुम्हारे बा'द जानाँ इश्क़ में लज़्ज़त नहीं है ना
किसी का जिस्म बातों से तो यूँ हम भी फँसा लें पर
बदन से खेलने की भी हमें आदत नहीं है ना
हमारे स्वप्न महलों में कोई रानी नहीं है अब
तुम्हारे बा'द ख़ाबों में कोई लड़की नहीं आती
किसी को देख कर धड़कन कि अब बजती नहीं वीणा
मुहब्बत के बग़ीचे में कोई कोयल नहीं गाती
यक़ीं मानो हमें अब फ़र्क़ ही पड़ता नहीं कोई
कोई हम से निभाए या कोई अपना बनाए फिर
हमारे इश्क़ में दीवाना हो के सामने या'नी
कोई मरता रहे अब या कि कोई मर ही जाए फिर
पर इतना है बला का जब ये खालीपन सताता है
तो इक लड़की को जा कर अपना हाल-ए-दिल बताते हैं
उसे कहते हैं न्यारी हो जहाँ में सब से प्यारी हो
उसे सपना दिखाते हैं उसे रानी बनाते हैं
तो फिर दोचार दिन तक फिर यही सब खेल चलता है
लिखी थी जो कभी तुम पर ग़ज़ल उस को सुनाते हैं
उसे कहते हैं कल ही तो तुम्हारे वास्ते लिक्खी
मगर दोचार दिन में ही अमा हम ऊब जाते हैं
महीनों फिर महीनों फिर महीनों फिर महीनों फिर
महीनों बा'द फिर जब दिल का खालीपन खटकता है
तुम्हारी याद कर देती है फिर से दर ब दर दिल को
कि दिल वीरानियों में आशियाने को भटकता है
वो लड़की मुद्दातों तक ध्यान भी जिस का नहीं आया
उसी को फ़ोन कर के फिर वही जुमले सुनाते हैं
तुम्हारी याद आती है तुम्हारे जैसी बस तुम हो
तुम्हीं हम को समझती हो फलाना है ढिकाना है
यही अपना फसाना है यही अपना फसाना है















