"शिकवा"
दिल तो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया है
फिर कैसा ये शिकवा गिला रह गया
घर का कोना कोना फूँक दिया हम ने
भला आईना ये कैसे बचा रह गया
रौशनी बन संग तुम्हारे चलूँगा कभी
वो जो कहता था मैं भी जलूँगा कभी
जा कर देखे कोई उस दिए को ज़रा
वो दिया तो बुझा का बुझा रह गया
— Vikas Sangam















