"अज़िय्यत"

इन आँखों के बादलों से ऐसी बरसात लगी
जब से दिल को तेरे रुख़्सती की बात लगी
किताब ख़ोल के मायूस मैं बैठा हूँ, लफ़्ज़ कोई ना
के क़लम को भी इज़तिरार अपनी ज़ात लगी

ग़ज़लों में जब ज़िक्रे-जानाँ था, तो लोगों को पसंदीदा थी
तहरीरों में जो तुम मिट गए, वही ग़ज़लें दिल-फ़िगार वारदात लगी
आख़री बार मिलने की हसरत अधूरी रह गई
झलक तेरी इन आँखों में भी जैसे मुश्किल से मिली ख़ैरात लगी

तलबगार हर शख़्स रहता जो तुझ को देख लेता
क्या ही था वो मंज़र जो सुकून भरी तेरी मुलाक़ात लगी
हमारी क़ुर्बत में साँसों का चलना अजब था
ख़ामोशी में भी दिलकश जैसे चलती नग़मात लगी

ख़ुशनुमा गुलिस्ताँ में शगुफ़्ता होती थी ख़ल्क़त
कुल्फ़ते-बेदार के मलबे में फ़सी पूरी काइनात लगी
काश तू कुछ पल ठहरता मेरी बातें सुनने
अब तो तारों को सुनाने भी कम हर रात लगी

— Zain Aalamgir

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