guzre hue waqton ka nishaan tha to kahaan tha | गुज़रे हुए वक़्तों का निशाँ था तो कहाँ था

  - Aamir Azher

गुज़रे हुए वक़्तों का निशाँ था तो कहाँ था
हम से जो निहाँ है वो अयाँ था तो कहाँ था

बस्ती का तक़ाज़ा है कहीं हैं तो कहाँ हैं
मजनूँ का बयाबाँ में मकाँ था तो कहाँ था

अब सोचते हैं बैठ के गुलशन की फ़ज़ा में
सहरा में हमारा जो मकाँ था तो कहाँ था

नश्शा ही नहीं सब का भरम टूट रहा था
कहते हैं कोई पीर-ए-मुग़ाँ था तो कहाँ था

इस तरह लिपटती है उदासी कि ये सोचें
दो पल की ख़ुशी का जो गुमाँ था तो कहाँ था

पीरी है बुज़ुर्गी है बुढ़ापा है कि क्या है
इस कर्ब में रहना कि जवाँ था तो कहाँ था

'आमिर' को हमीं ढूँड के लाएँ हैं ब-मुश्किल
कहते हैं वो पहले से यहाँ था तो कहाँ था

  - Aamir Azher

Wahshat Shayari

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