ज़माना इक जिसे अपना बनाने में लगा है
वही इक शख़्स अब मुझ को भुलाने में लगा है
लगे थे एक दो पल और मोहब्बत हो गई थी
ज़माना पर ज़माने को मनाने में लगा है
मोहब्बत को भले कहता है नेमत ये ज़माना
मोहब्बत को जहाँ से पर मिटाने में लगा है
कोई आशिक़ नहीं है वो तो दीवाना है 'आतिश'
ग़मों से घर क़रीने से सजाने में लगा है
— Aatish Indori















