करते हैं जो बंदगी रोज़
रहती उन पर रौशनी रोज़
बैठना मत मान के हार
है बदलती ज़िंदगी रोज़
शा'इरी की लत लगी थी
कर न पाए नौकरी रोज़
एक ऐसे मोड़ पर हूँ
अपने लगते अजनबी रोज़
वा'दा कर के ख़ुद से ही अब
भूल जाता आदमी रोज़
— Adarsh Akshar
रहती उन पर रौशनी रोज़
बैठना मत मान के हार
है बदलती ज़िंदगी रोज़
शा'इरी की लत लगी थी
कर न पाए नौकरी रोज़
एक ऐसे मोड़ पर हूँ
अपने लगते अजनबी रोज़
वा'दा कर के ख़ुद से ही अब
भूल जाता आदमी रोज़
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