"चाँद तकता है रातों को छत से तुझे"

क्यूँ है इतनी जवाँ क्यूँ है इतनी हसीं
नाम किस ने रखा तेरा ज़ोहरा-जबीं
तंग सी टॉप पहने अब आना नहीं
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे
राह में देखता है पलट के तुझे
मुझ को डर है कहीं ले न जाए तुझे
राह में देखता है पलट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

चाँद में दाग़ है फिर भी मग़रूर है
लग रहा अपनी आदत से मजबूर है
तू जिधर जा रहा चाँद उधर आ रहा
ये तुझे देख कर कितना शर्मा रहा
आड़ में देखता है सिमट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

ख़ूब-सूरत बहुत लग रही आज तू
आज से बन गई मेरी मुमताज़ जब
कैसी कारीगरी है ख़ुदा की क़सम
ज़ुल्फ़ से पाँव तक ज़हर है तू सनम
मैं तिरी जान हूँ तू मिरी जान है
ख़्वाब में देखता हूँ लिपट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

अपनी सूरत दिखा दे ख़ुदा के लिए
मुझ को दिल में बसा ले ख़ुदा के लिए
अब तो घर से निकल आ ख़ुदा के लिए
मुझ को अपना बना ले ख़ुदा के लिए
उम्र भर के लिए बाहों में थाम ले
ओ मिरी जान-ए-मन दिल से तू काम ले
ऐसी बारिश में देखूँ रपट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

माल ज़ेवर छिपे तेरी पोशाक में
हैं फ़रिश्ते ख़ुदा सब तिरी ताक में
जान ऐसे में घर से निकलना नहीं
कोई ले जाएगा तुझ को अफ़्लाक में
कुछ न कुछ बात तो तुझ
में है जान-ए-मन
यूँ ही थोड़ी लुटाते हैं सब जान-ए-तन
तेरी बाहों में देखूँ लिपट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

तू अकेले दुकेले न जाना कहीं
तुझ को समझा रहा हूँ मिरी हम-नशीं
मैं कहीं रह न पाऊँगा तेरे बिना
तू मुझे छोड़ कर यार जाना नहीं
तेरी आँखों से मौसम बदलने लगा
तेरी ज़ुल्फ़ों में जादू सा चलने लगा
तेरे काँधे से पल्लू सरकने लगा
जिस ने देखा नज़ारा ये जलने लगा
नींद में देखता हूँ उचट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

जाँ तिरे नाम की जोश ही जोश में
ख़ुद को रक्खूँगा अब तेरी आग़ोश में
आते जाते सभी छेड़ते हैं तुझे
टकटकी बाँध के देखते हैं तुझे
हाँ बहुत देर तक देखते हैं तुझे
चाँद तारे तुझे ताड़ते हैं सभी
फ़ालतू में ही मुँह फाड़ते हैं सभी
सब से ले जाऊँगा मैं झपट के तुझे
चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

— Prashant Kumar

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