साँस लेना भी सज़ा लगता है

अब तो मरना भी रवा लगता है

कोह-ए-ग़म पर से जो देखूँ तो मुझे
दश्त आग़ोश-ए-फ़ना लगता है

सर-ए-बाज़ार है यारों की तलाश
जो गुज़रता है ख़फ़ा लगता है

मौसम-ए-गुल में सर-ए-शाख़-ए-गुलाब
शो'ला भड़के तो बजा लगता है

मुस्कुराता है जो इस आलम में
ब-ख़ुदा मुझ को ख़ुदा लगता है

इतना मानूस हूँ सन्नाटे से
कोई बोले तो बुरा लगता है

उन से मिल कर भी न काफ़ूर हुआ
दर्द ये सब से जुदा लगता है

नुत्क़ का साथ नहीं देता ज़ेहन
शुक्र करता हूँ गिला लगता है

इस क़दर तुंद है रफ़्तार-ए-हयात
वक़्त भी रिश्ता-बपा लगता है

— Ahmad Nadeem Qasmi

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