लम्हा लम्हा शुमार कौन करे

उम्र भर इंतिज़ार कौन करे

कोई व'अदा भी तो वफ़ा न हुआ
बे-वफ़ाओं से प्यार कौन करे

शब-ए-तीरा-ओ-तार का दामन
देखिए तार तार कौन करे

दोस्ती एक लफ़्ज़-ए-बे-मअ'नी
किस पे अब इंहिसार कौन करे

ऐ ग़म-ए-दोस्त तेरे होते हुए
ग़म-ए-लैल-ओ-नहार कौन करे

तेरे इस दर्द-ए-ला-दवा का इलाज
दिल-ए-ज़ार-ओ-नज़ार कौन करे

सिलसिला टूटना था टूट गया
अब उसे उस्तुवार कौन करे

— Ahmad Rahi

More by Ahmad Rahi

Other ghazal from the same pen

See all from Ahmad Rahi →

Wafa Shayari

Shers of wafa.

All Wafa Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling