chehra-e-hoor-shumail ke tasaaveer pe KHaak | चेहरा-ए-हूर-शुमाइल के तसावीर पे ख़ाक

  - Faiz Ahmad

चेहरा-ए-हूर-शुमाइल के तसावीर पे ख़ाक
उसके रुख़सार के आगे तो हर इक हीर पे ख़ाक

शाहज़ादी के लिए ख़ंजर-ओ-शमशीर पे ख़ाक
ताज पे ख़ाक मिरी हसरत-ए-तस्खीर पे ख़ाक

अक्स-ए-जानाँ को कभी इसने उतरने न दिया
दिल-ए-ना-काम तिरे शीशा-ए-तक़दीर पे ख़ाक

किया जो उनके लब-ओ-आरिज़-ए-गुल का दीदार
डाल दी मैंने गुल-ओ-गुलशन-ए-कश्मीर पे ख़ाक

दौर-ए-खुदगर्ज़ी में भी दे रहा है आब-ए-नशात
मेरे साकी पे लगी तोहमत-ए-तज़वीर पे ख़ाक

बज़्म-ए-जानाँ जो नहीं तो दर-ए-साकी पे जा
डाल दे गर्दिश-ए-अय्याम की तदबीर पे ख़ाक

  - Faiz Ahmad

Shama Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Faiz Ahmad

As you were reading Shayari by Faiz Ahmad

Similar Writers

our suggestion based on Faiz Ahmad

Similar Moods

As you were reading Shama Shayari Shayari