अर्ज़ कुछ करना था फ़ुर्सत हो अगर
बोल दूँ तुम से मोहब्बत हो अगर
क़दमों पर तेरे दोबारा हूँ फ़िदा
जिस्म में थोड़ी भी हरकत हो अगर
वस्ल-ओ-फुर्क़त की हदों से तू निकल
बस मोहब्बत हो मोहब्बत हो अगर
कुछ न हो दिल में न यादें हों न आस
ऐसे रुख़्सत हो तू रुख़्सत हो अगर
याद आता भी नहीं अब मैं तुम्हें
याद आ जाऊँ इजाज़त हो अगर
— Ajmal Siddiqui















