पेश जो आया सर-ए-साहिल-ए-शब बतलाया
मौज-ए-ग़म को भी मगर मौज-ए-तरब बतलाया
रंग महफ़िल का अजब हो गया जिस दम उस ने
ख़ामुशी को भी मेरी हुस्न-ए-तलब बतलाया
है बताने की कोई चीज़ भला नाम-ओ-नसब
हम ने पूछा न कभी नाम-ओ-नसब बतलाया
दिल को दुनिया से सरोकार कभी था ही नहीं
आँख ने भी मगर उस रुख़ को अजब बतलाया
यूँ ही आया था तेरा ज़िक्र कहीं और हम ने
जो तेरे बाब में मालूम था सब बतलाया
ये उदासी का सबब पूछने वाले 'अजमल'
क्या करेंगे जो उदासी का सबब बतलाया
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