जहाँ में हाल मिरा इस क़दर ज़बून हुआ

कि मुझ को देख के बिस्मिल को भी सुकून हुआ

ग़रीब दिल ने बहुत आरज़ूएँ पैदा कीं
मगर नसीब का लिक्खा कि सब का ख़ून हुआ

वो अपने हुस्न से वाक़िफ़ मैं अपनी अक़्ल से सैर
उन्हों ने होश सँभाला मुझे जुनून हुआ

उम्मीद-ए-चश्म-ए-मुरव्वत कहाँ रही बाक़ी
ज़रीया बातों का जब सिर्फ़ टेलीफ़ोन हुआ

निगाह-ए-गर्म क्रिसमस में भी रही हम पर
हमारे हक़ में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ

— Akbar Allahabadi

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