इक ख़्वाब मुसलसल था कि खुलता ही नहीं था

क्या पेड़ था जिस का कोई साया ही नहीं था

वो दर्द उठा आज कि दिल बैठ रहा है
कश्ती हुई तय्यार तो दरिया ही नहीं था

माथे पर शिकन कोई न एहसास-ए-नदामत
वो कटते सरों को कभी गिनता ही नहीं था

अब जान पे बन आई तो एहसास हुआ है
जो देख रहे थे वो तमाशा ही नहीं था

सदियों की वफ़ाओं पे मुसल्लत रहा हर दम
इक लम्हा-ए-इंकार जो गुज़रा ही नहीं था

— Amit Bajaj

More by Amit Bajaj

Other ghazal from the same pen

See all from Amit Bajaj →

Fantasy Shayari

Shers of fantasy.

All Fantasy Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling