वफ़ा का मिरी क्या सिला दीजिएगा

ग़म-ए-दिल की लज़्ज़त बढ़ा दीजिएगा

मुझे देख कर मुस्कुरा दीजिएगा
यूँही मेरी हस्ती मिटा दीजिएगा

सिला दिल लगाने का क्या दीजिएगा
सितम दीजिएगा सज़ा दीजिएगा

सुकूँ की तलब मुझ को हरगिज़ नहीं है
बस इक दर्द का सिलसिला दीजिएगा

ख़ुशी बाँटने के नहीं आप क़ाइल
तो ग़म ही मुझे कुछ सिवा दीजिएगा

मुझे क्या ख़बर थी कि ख़ुद लौह-ए-दिल पर
मिरा नाम लिख कर मिटा दीजिएगा

सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ'
ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा

— Anwar Taban

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