"तलाश"

हम तो दीवार-ओ-दर से थे उलझे हुए
हम ने चाहा था साँसों की सरगम बने
हम ने चाहा था दीदार-ए-महबूब हो
हम सदाएँ तेरे दर पे देते रहे
रक़्स करते रहे गीत गाते रहे
खोए खोए ख़लाओं से घिरते रहे
वक़्त रखता है दामन में यादें तेरी
इन हवाओं से आती है ख़ुशबू तेरी
देखते देखते तेरी तस्वीर को
चाँद तारों भरी तेरी ता'बीर से
उलझे उलझे हैं तेरे ही मंज़र सभी
हम ने आँखों से देखी है दुनिया तेरी
हम निसाबों से घिर के अजाबों में हैं
ये जहाँ तो है हम पे अजाब-ए-सफ़र
तेरे कहने पे लेकिन निकल आए है
तेरे कहने पे हम ने क्या कुछ किया
तेरे कहने पे इक रोज़ मर जाएँगे
पर जहाँ को है तेरी ज़रूरत बड़ी
तू कहाँ है कहाँ है कहाँ है कहाँ

— Aves Sayyad

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