ranj ki jab guftugoo hone lagi | रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी

  - Dagh Dehlvi

रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी
आप से तुम तुम से तू होने लगी

चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़
लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी

मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई
उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी

है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब
हर किसी के रू-ब-रू होने लगी

ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल
क्यूँ हमारे रू-ब-रू होने लगी

ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर
आरज़ू की आरज़ू होने लगी

अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो
फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी

'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज
शायद उन की आबरू होने लगी

  - Dagh Dehlvi

Aabroo Shayari

Our suggestion based on your choice

    तुम्हें लगा है कि मेरे होते, तुम्हें भी दिल में जगह मिलेगी
    बड़ी ही इज़्ज़त से कह रहा हूँ ,चलो उठो अब मेरी जगह से
    Shadab Asghar
    ऐ "दाग़" बुरा मान ना तू उसके कहे का
    माशूक की गाली से तो इज़्ज़त नहीं जाती
    Dagh Dehlvi
    45 Likes
    ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं
    देर से पट्टी खोलेंगे

    चेहरा पढ़ने वाले चोर
    गठरी थोड़ी खोलेंगे
    Read Full
    Khurram Afaq
    29 Likes
    कम से कम मैंने छुपा ली देख कर सिगरेट तुम्हें
    और इस लड़के से तुमको कितनी इज़्ज़त चाहिए
    Nadeem Shaad
    40 Likes
    लड़ सको दुनिया से जज़्बों में वो शिद्दत चाहिए
    इश्क़ करने के लिए इतनी तो हिम्मत चाहिए

    कम से कम मैंने छुपा ली देख कर सिगरेट तुम्हें
    और इस लड़के से तुमको कितनी इज़्ज़त चाहिए
    Read Full
    Nadeem Shaad
    81 Likes
    हर किसी से ही मुहब्बत माँगता है
    दिल तो अब सबसे अक़ीदत माँगता है

    सीख आया है सलीक़ा ग़ुफ़्तगू का
    मुझसे मेरा दोस्त इज्ज़त माँगता है
    Read Full
    चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ
    हर पर्दा पर्दा नइँ होता इतना मैं भी जानता हूँ
    Ali Zaryoun
    77 Likes
    ज़िंदा रहने की ये तरक़ीब निकाली हमने
    बात बिगड़ी हुई कुछ ऐसे सँभाली हमने

    उससे समझौता किया है उसी की शर्तों पे
    जान भी बच गई इज़्ज़त भी बचा ली हमने
    Read Full
    Divyansh Shukla
    मजबूरी में रक़ीब ही बनना पड़ा मुझे
    महबूब रहके मेरी जो इज़्ज़त नहीं हुई
    Sabahat Urooj
    48 Likes
    सुन ओ कहानीकार कोई ऐसा रोल दे
    ऐसे अदा करूं मेरी इज़्ज़त बनी रहे
    Afzal Ali Afzal
    26 Likes

More by Dagh Dehlvi

As you were reading Shayari by Dagh Dehlvi

    देख कर जोबन तिरा किस किस को हैरानी हुई
    इस जवानी पर जवानी आप दीवानी हुई

    पर्दे पर्दे में मोहब्बत दुश्मन-ए-जानी हुई
    ये ख़ुदा की मार क्या ऐ शौक़-ए-पिन्हानी हुई

    दिल का सौदा कर के उन से क्या पशेमानी हुई
    क़द्र उस की फिर कहाँ जिस शय की अर्ज़ानी हुई

    मेरे घर उस शोख़ की दो दिन से मेहमानी हुई
    बेकसी की आज कल क्या ख़ाना-वीरानी हुई

    तर्क-ए-रस्म-ओ-राह पर अफ़्सोस है दोनों तरफ़
    हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई

    इब्तिदा से इंतिहा तक हाल उन से कह तो दूँ
    फ़िक्र ये है और जो कह कर पशेमानी हुई

    ग़म क़यामत का नहीं वाइ'ज़ मुझे ये फ़िक्र है
    दीन कब बाक़ी रहा दुनिया अगर फ़ानी हुई

    तुम न शब को आओगे ये है यक़ीं आया हुआ
    तुम न मानोगे मिरी ये बात है मानी हुई

    मुझ में दम जब तक रहा मुश्किल में थे तीमारदार
    मेरी आसानी से सब यारों की आसानी हुई

    इस को क्या कहते हैं उतना ही बढ़ा शौक़-ए-विसाल
    जिस क़दर मशहूर उन की पाक-दामानी हुई

    बज़्म से उठने की ग़ैरत बैठने से दिल को रश्क
    देख कर ग़ैरों का मजमा क्या परेशानी हुई

    दावा-ए-तस्ख़ीर पर ये उस परी-वश ने कहा
    आप का दिल क्या हुआ मोहर-ए-सुलेमानी हुई

    खुल गईं ज़ुल्फ़ें मगर उस शोख़ मस्त-ए-नाज़ की
    झूमती बाद-ए-सबा फिरती है मस्तानी हुई

    मैं सरापा सज्दे करता उस के दर पर शौक़ से
    सर से पा तक क्यूँ न पेशानी ही पेशानी हुई

    दिल की क़ल्ब-ए-माहियत का हो उसे क्यूँकर यक़ीं
    कब हवा मिट्टी हुई है आग कब पानी हुई

    आते ही कहते हो अब घर जाएँगे अच्छी कही
    ये मसल पूरी यहाँ मन-मानी घर जानी हुई

    अरसा-ए-महशर में तुझ को ढूँड लाऊँ तो सही
    कोई छुप सकती है जो सूरत हो पहचानी हुई

    देख कर क़ातिल का ख़ाली हाथ भी जी डर गया
    उस की चीन-ए-आस्तीं भी चीन-ए-पेशानी हुई

    खा के धोका उस बुत-ए-कमसिन ने दामन में लिए
    अश्क-अफ़्शानी भी मेरी गौहर-अफ़्शानी हुई

    बेकसी पर मेरी अपनी तेग़ की हसरत तो देख
    चश्म-ए-जौहर भी ब-शक्ल-ए-चश्म-ए-हैरानी हुई

    बेकसी पर 'दाग़' की अफ़्सोस आता है हमें
    किस जगह किस वक़्त उस की ख़ाना-वीरानी हुई
    Read Full
    Dagh Dehlvi
    जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं
    खिंची हैं काँटों पे जो पत्तियाँ गुलाब की थीं
    Dagh Dehlvi
    42 Likes
    भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं
    किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँ बन के बैठे हैं

    दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं
    कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं

    इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है
    हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं

    ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ
    अभी फिर रूठ जाएँगे अभी तो मन के बैठे हैं

    असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे
    हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं

    सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में
    कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं

    फ़ुसूँ है या दुआ है या मुअ'म्मा खुल नहीं सकता
    वो कुछ पढ़ते हुए आगे मिरे मदफ़न के बैठे हैं

    बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है
    कि आप आँसू बहाते सामने दुश्मन के बैठे हैं

    खड़े हों ज़ेर-ए-तूबा वो न दम लेने को दम भर भी
    जो हसरत-मंद तेरे साया-ए-दामन के बैठे हैं

    तलाश-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद की गर्दिश उठ नहीं सकती
    कमर खोले हुए रस्ते में हम रहज़न के बैठे हैं

    ये जोश-ए-गिर्या तो देखो कि जब फ़ुर्क़त में रोया हूँ
    दर ओ दीवार इक पल में मिरे मदफ़न के बैठे हैं

    निगाह-ए-शोख़ ओ चश्म-ए-शौक़ में दर-पर्दा छनती है
    कि वो चिलमन में हैं नज़दीक हम चिलमन के बैठे हैं

    ये उठना बैठना महफ़िल में उन का रंग लाएगा
    क़यामत बन के उट्ठेंगे भबूका बन के बैठे हैं

    किसी की शामत आएगी किसी की जान जाएगी
    किसी की ताक में वो बाम पर बन-ठन के बैठे हैं

    क़सम दे कर उन्हें ये पूछ लो तुम रंग-ढंग उस के
    तुम्हारी बज़्म में कुछ दोस्त भी दुश्मन के बैठे हैं

    कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ
    अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं
    Read Full
    Dagh Dehlvi
    फिरे राह से वो यहाँ आते आते
    अजल मर रही तू कहाँ आते आते

    न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
    बहुत देर की मेहरबाँ आते आते

    सुना है कि आता है सर नामा-बर का
    कहाँ रह गया अरमुग़ाँ आते आते

    यक़ीं है कि हो जाए आख़िर को सच्ची
    मिरे मुँह में तेरी ज़बाँ आते आते

    सुनाने के क़ाबिल जो थी बात उन को
    वही रह गई दरमियाँ आते आते

    मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
    निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते

    अभी सिन ही क्या है जो बेबाकियाँ हों
    उन्हें आएँगी शोख़ियाँ आते आते

    कलेजा मिरे मुँह को आएगा इक दिन
    यूँही लब पर आह-ओ-फ़ुग़ाँ आते आते

    चले आते हैं दिल में अरमान लाखों
    मकाँ भर गया मेहमाँ आते आते

    नतीजा न निकला थके सब पयामी
    वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते

    तुम्हारा ही मुश्ताक़-ए-दीदार होगा
    गया जान से इक जवाँ आते आते

    तिरी आँख फिरते ही कैसा फिरा है
    मिरी राह पर आसमाँ आते आते

    पड़ा है बड़ा पेच फिर दिल-लगी में
    तबीअत रुकी है जहाँ आते आते

    मिरे आशियाँ के तो थे चार तिनके
    चमन उड़ गया आँधियाँ आते आते

    किसी ने कुछ उन को उभारा तो होता
    न आते न आते यहाँ आते आते

    क़यामत भी आती थी हमराह उस के
    मगर रह गई हम-इनाँ आते आते

    बना है हमेशा ये दिल बाग़ ओ सहरा
    बहार आते आते ख़िज़ाँ आते आते

    नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो
    कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते
    Read Full
    Dagh Dehlvi
    दिल-ए-नाकाम के हैं काम ख़राब
    कर लिया आशिक़ी में नाम ख़राब

    इस ख़राबात का यही है मज़ा
    कि रहे आदमी मुदाम ख़राब

    देख कर जिंस-ए-दिल वो कहते हैं
    क्यूँ करे कोई अपने दाम ख़राब

    अब्र-ए-तर से सबा ही अच्छी थी
    मेरी मिट्टी हुई तमाम ख़राब

    वो भी साक़ी मुझे नहीं देता
    वो जो टूटा पड़ा है जाम ख़राब

    क्या मिला हम को ज़िंदगी के सिवा
    वो भी दुश्वार ना-तमाम ख़राब

    वाह क्या मुँह से फूल झड़ते हैं
    ख़ूब-रू हो के ये कलाम ख़राब

    चाल की रहनुमा-ए-इश्क़ ने भी
    वो दिखाया जो था मक़ाम ख़राब

    'दाग़' है बद-चलन तो होने दो
    सौ में होता है इक ग़ुलाम ख़राब
    Read Full
    Dagh Dehlvi

Similar Writers

our suggestion based on Dagh Dehlvi

Similar Moods

As you were reading Aabroo Shayari Shayari