हवा ने साँस लिया था
अभी कहानी में
फ़लक की आँख में शो'ले
अभी दहकते थे
थकन की गोंद ने चिपका रखे थे
जिस्म से पर
शफ़क़ के लोथड़े बिखरे हुए थे
पानी में
नमाज़-ए-अस्र अदा होनी थी
हुई कि नहीं
परिंद झील पर उतरे
मगर वज़ू न किया
— Daniyal Tareer
अभी कहानी में
फ़लक की आँख में शो'ले
अभी दहकते थे
थकन की गोंद ने चिपका रखे थे
जिस्म से पर
शफ़क़ के लोथड़े बिखरे हुए थे
पानी में
नमाज़-ए-अस्र अदा होनी थी
हुई कि नहीं
परिंद झील पर उतरे
मगर वज़ू न किया
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