"मैं क़ातिल हूँ"

घर की छत पे मेरे अक्सर इक पंछी का जोड़ा आता
साथ में आते थे दोनों और घंटो तक बैठे रहते थे
बातें करते थे आपस में
पानी पीते, दाना चुगते
देखते रहते इक दूजे को जैसे मानो
साथ है इनका जन्मों से जन्मों-जन्मों का
देख के उन को ख़ुश होता रहता था मैं भी
कल शब मेरे सामने मेरी छत पे आए
इक दूजे की सोहबत में बैठे थे दोनों
लेकिन
फिर माँझे से मेरे इक पंछी का क़त्ल हो गया
उस की थोड़ी देर बा'द दूजे पंछी ने
पंखे से ख़ुद ही कट कर के जान गँवा दी
मेरे सपने में आता है अब वो जोड़ा
और एहसास दिलाता है के
मैं क़ातिल हूँ

— Dipendra Singh 'Raaz'

More by Dipendra Singh 'Raaz'

Other nazm from the same pen

See all from Dipendra Singh 'Raaz' →

Raat Shayari

Shers of raat.

All Raat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling