तेरी तुर्बत

तेरी आवाज़ों का गुम्बद
एक वज़ीफ़ा
जिस से गुम्बद का पोशीदा दर खुल जाता
भूल गया था
उस की ख़ातिर जाने कितने वीराने और कितने बसेरे मैं ने छाने
पर वो मुक़द्दस पाँव की मिट्टी न मिल सकी
जिस को इस मूरत पर मलता
तो तेरी ही आवाज़ निकलती
तेरी चाँद सी आवाज़ों पर
पत्थर जैसा बादल
बरस बरस कर घुल जाता
तो चाँदनी मेरे भीतर की भसमाने वाली आग बुझाती
मेरा जिस्म भी
तेरी आवाज़ों का मरक़द
अंदर इक तूफ़ान था
आवाज़ों के शो'ले चटख़ रहे थे
बाहर
हूँ का आलम
तेरी आवाज़ों में रंग थे
मीठे ठंडे और रसीले
मेरी आवाज़ों में चीख़ें
तेरी आवाज़ों के रंग मैं जंगल जंगल ढूँड रहा था
आँख उठा कर देखा
तो तेरी ही आवाज़ों के रंग हैं
जो आकाश पे बिखरे पड़े हैं

— Ejaz Farooqi

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