tiri gali si kisi bhi gali ki shaan nahin | तिरी गली सी किसी भी गली की शान नहीं

  - Fakhr Zaman

तिरी गली सी किसी भी गली की शान नहीं
कि इस ज़मीन पे सुनते हैं आसमान नहीं

मिज़ा से बढ़ के नहीं है जो कोई तीर-ए-हसीं
तुम्हारे अबरू से दिलकश कोई कमान नहीं

सिसक रहे हैं जो सड़कों पे सैंकड़ों इंसाँ
तुम्हारे शहर में शायद कोई मकान नहीं

यहीं बहिश्त है यारो यहीं है दोज़ख़ भी
कि इस जहान से आगे कोई जहान नहीं

मिरी ख़मोशी का मतलब नहीं क़रार-ओ-सुकूँ
भरा है दर्दस दिल ताक़त-ए-बयान नहीं

अदू को देते हैं तरजीह मुझ से ख़ादिम पर
बुरे-भले के परी-वश मिज़ाज-दान नहीं

हमारे शहर में हर एक इस तरह चुप है
कि जैसे मुँह में किसी शख़्स के ज़बान नहीं

ये अश्क मंज़िल-ए-आख़िर हैं 'इश्क़ की हमदम
कि इन सितारों से आगे कोई निशान नहीं

हो 'फ़ख़्र' ख़ाक मुझे क़ौम की तरक़्क़ी पर
जो फ़र्द-ए-क़ौम ये मज़दूर और किसान नहीं

  - Fakhr Zaman

Shehar Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Fakhr Zaman

As you were reading Shayari by Fakhr Zaman

Similar Writers

our suggestion based on Fakhr Zaman

Similar Moods

As you were reading Shehar Shayari Shayari