जो राज़दार थे पहले वो दुश्मन-ए-जाँ हैं
मगर जो दुश्मन-ए-जाँ थे वो राज़दार हुए
गुनाह ख़ुद ही किया ख़ुद को फिर सज़ा दे ली
हम अपने हाथों कई बार संगसार हुए
कभी फ़साना सुना कर भी आँख नम न हुई
तुम्हारे ज़िक्र पे ही आज अश्क-बार हुए
हर एक चीज़ की इस दौर में सिफ़त बदली
पहाड़ शहर बने शहर कोहसार हुए
वो पौदे जिन के सरापे बड़े मुलाएम थे
हमारे देखते लम्हों में ख़ार-दार हुए
गरेबाँ जिन पे भरोसा था हम फ़क़ीरों को
जुनूँ की आँच से पल-भर में तार तार हुए
बढ़ाएँ उन की तरफ़ दस्त-ए-दोस्ती क्यूँ-कर
जो गुल-सिफ़त थे कभी 'फ़ख़्र' अब वो ख़ार हुए
— Fakhr Zaman















