चमन में शब को जो वो शोख़ बे-नक़ाब आया
यक़ीन हो गया शबनम को आफ़्ताब आया
उन अँखड़ियों में अगर नश्शा-ए-शराब आया
सलाम झुक के करूँँगा जो फिर हिजाब आया
किसी के महरम-ए-आब-ए-रवाँ की याद आई
हबाब के जो बराबर कभी हबाब आया
शब-ए-फ़िराक़ में मुझ को सुलाने आया था
जगाया मैं ने जो अफ़्साना-गो को ख़्वाब आया
अदम में हस्ती से जा कर यही कहूँगा मैं
हज़ार हसरत-ए-ज़िंदा को गाड़ दाब आया
चकोर हुस्न-ए-मह-ए-चार-दह को भूल गया
मुराद पर जो तिरा आलम-ए-शबाब आया
मोहब्बत-ए-मय-ओ-माशूक़ तर्क कर 'आतिश'
सफ़ेद बाल हुए मौसम-ए-ख़िज़ाब आया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Haidar Ali Aatish
our suggestion based on Haidar Ali Aatish
As you were reading Raushni Shayari Shayari