"हमारा गाँव"

सुनो अपने मैं तेलिया गाँव का क़िस्सा सुनाता हूँ
तुम्हें लफ्ज़ों में अपने आज बहराइच दिखाता हूँ

जहाँ पर सड़कें कच्ची हैं, जहाँ हर सम्त ग़ुरबत है
जहाँ पर आज भी लोगों को शिक्षा की ज़रूरत है

जहाँ के लोग पैसों के लिए परदेस जाते हैं
वो खा के रूखी सूखी रोटीयाँ पैसे कमाते हैं

मगर फिर भी हमारे गाँव के लोगों में उल्फ़त है
हमें इस गाँव से हर हाल में बेशक मुहब्बत है

मुझे वो खेत, वो बगिया, सभी अब याद आते हैं
मैं हूँ लखनऊ में लेकिन मुझे वो सब बुलाते हैं

हमारे गाँव से कुछ दूरी पर सरजू निकलती है
नहाओ जब भी उस पानी में तो ख़ुशबू निकलती है

बताएँ किस क़दर हम धूप में न छाँव में बैठे
गए जब भी हम अपने मदरसे तो नाँव में बैठे

वो बहता सरजू का पानी हमारा नाँव में होना
नज़ारा कितना दिलकश था हमारा गाँव में होना

— Hameed Sarwar Bahraichi

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