एल्बम से, डाइरी से, ग़ज़ल से व याद से
बे दख़्ल कर रहा हूँ तुम्हें जायदाद से
मिक़दार को बढ़ाने में में'यार गिर गया
लज़्ज़त ख़राब हो गई फ़स्लों की, खाद से
हम में जो रब्त था वो बहुत दर्दनाक था
होता है जैसे ज़ख़्म का रिश्ता मवाद से
मैं वो हूँ जिस का क़र्ज़ से होता गुज़र बसर
तुम वो हो जिस का काम चले है मुफ़ादस
अपनी मुराद होगी किसी और की हयात
हम देखते रहेंगे खड़े ना-मुराद से
मातम मना रहे हैं यहाँ शा'इरी से हम
ढांढस बंधा रहे हैं हमें लोग दाद से
— आफ़ताब "आस"















