पुकारें लाख हम जिन को वो तन्हा छोड़ देते हैं
चलो हम साथ मिल कर ये ज़माना छोड़ देते हैं
बहुत पाने की चाहत में जो थोड़ा छोड़ देते हैं
बड़े होकर वो रिश्तों को निभाना छोड़ देते हैं
वो जो अहल ए जहाँ के आँसू बिन पोछे नहीं रहते
मेरी आँखों के अश्कों को वो बहता छोड़ देते हैं
ख़ुशी के शाम में नईं हो उदासी तेरे चेहरे पर
जा अब हम भी तेरी गलियों में आना छोड़ देते हैं
मुझे उस किस्म के घर में कभी अच्छा नहीं लगता
जहाँ बूढ़ों की इज़्ज़त लोग करना छोड़ देते हैं
वो अपनी ज़िंदगी में हम सफ़र कुछ यूँ बदलते हैं
नया गर मिल गया कोई पुराना छोड़ देते हैं
यही बस इक ग़लतफ़हमी में वो हर रोज़ पीते हैं
जो पीना छोड़ देते हैं वो जीना छोड़ देते हैं















