तू मुहब्बत के क़ाबिल नहीं है
गर वफ़ा ख़ूँ में शामिल नहीं है
ज़ीस्त कैसे तिरे साथ काटूँ
तू समंदर है साहिल नहीं है
हिज्र में छोड़ दे साँस लेना
कोई इतना भी जाहिल नहीं है
शहर में हुस्न वाले तो हैं पर
कोई तेरे मुक़ाबिल नहीं है
बद-नज़र से ज़रा बच के रहना
तेरे रुख़सार पे तिल नहीं है
रूह प्यासी मरेगी दिवाने
इश्क़ को जिस्म हासिल नहीं है
ये भी क़ुदरत की कारीगरी है
कोई इंसान कामिल नहीं है
दर्द-ए-दिल सहना मुश्किल है 'सागर'
दिल लगाने में मुश्किल नहीं है
— SAAGAR SINGH RAJPUT















