पोशीदा था जो सब पे अयाँ क्यूँँ नहीं हुआ
हक़ में हमारे नेक गुमाँ क्यूँँ नहीं हुआ
सरसब्ज़ हो के दिल-नशीं बन जाती ये ज़मीं
ऐसा गुदाज़ सैल-ए-रवाँ क्यूँँ नहीं हुआ
नग़्मों के दरमियान फ़साना था पुर-कशिश
दिलकश फ़ज़ा में रक़्स जवाँ क्यूँँ नहीं हुआ
कल तक गली हमारी दरख़्शाँ न हो सकी
अब तो बताओ ऐसा मियाँ क्यूँँ नहीं हुआ
शान-ओ-शिकोह में वो हमेशा था ताज़ा-दम
घर की फ़ज़ा में जज़्ब मकाँ क्यूँँ नहीं हुआ
जलता रहा हमारा ज़माना चहार-सू
शो'लों के बीच उस का जहाँ क्यूँँ नहीं हुआ
चेहरा खुला सा उन की नज़र के क़रीब था
पेश-ए-निगाह दर्द-ए-निहाँ क्यूँँ नहीं हुआ
हैरत-ज़दा थी अक़्ल हमारी ये सोच कर
जो कुछ वहाँ हुआ था यहाँ क्यूँँ नहीं हुआ
हम्द-ओ-सना दु'आ से सँवारा गया था शहर
'जाफ़र' मगर वो जा-ए-अमाँ क्यूँँ नहीं हुआ
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