kisne samjha hai auraton ka dukh | किसने समझा है औरतों का दुख

  - 'June' Sahab Barelvi

किसने समझा है औरतों का दुख
रेज़ा रेज़ा है औरतों का दुख

तज़्किरा भी न कर सके औरत
कौन सुनता है औरतों का दुख

मर्द का दुख बड़ा या औरत का
मुझको लगता है औरतों का दुख

दाद-ए-यज़्दानी मिलती है उसको
जो समझता है औरतों का दुख

चीरतीं पेट नस्ल-दर-नस्लें
समझो कितना है औरतों का दुख

जन्म से लेके ख़ाक होने तक
बढ़ता रहता है औरतों का दुख

हो के हैरान एक दूजे के
चेहरे तकता है औरतों का दुख

या ख़ुदा कुछ तो राहतें हों अता
कम न होता है औरतों का दुख

अब यक़ीनन कहेगा हर कोई
जू'न लिखता है औरतों का दुख

  - 'June' Sahab Barelvi

Aurat Shayari

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