badi talab thi bada intizaar dekho to | बड़ी तलब थी बड़ा इंतिज़ार देखो तो

  - Kaleem Aajiz

बड़ी तलब थी बड़ा इंतिज़ार देखो तो
बहार लाई है कैसी बहार देखो तो

ये क्या हुआ कि सलामत नहीं कोई दामन
चमन में फूल खिले हैं कि ख़ार देखो तो

लहू दिलों का चराग़ों में कल भी जलता था
और आज भी है वही कारोबार देखो तो

यहाँ हर इक रसन-ओ-दार ही दिखाता है
अजीब शहर अजीब शहरयार देखो तो

न कोई शाना बचा है न कोई आईना
दराज़-दस्ती-ए-गेसू-ए-यार देखो तो

किसी से प्यार नहीं फिर भी प्यार है सब से
वो मस्त-ए-हुस्न है क्या होशियार देखो तो

वो चुप भी बैठे है तो ऐसा बन के बैठे है
हर इक अदा ये कहे है पुकार देखो तो

अभी तो ख़ून का सिन्दूर ही लगाया है
अभी करे है वो क्या क्या सिंगार देखो तो

अदा हमीं ने सिखाई नज़र हमीं ने दी
हमीं से आँख चुराओ हो यार देखो तो

असीर कर के हमें क्या फिरे है इतराता
गले में डाले वो फूलों का हार देखो तो

  - Kaleem Aajiz

Basant Shayari

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