'मतलबी'

तेरा हुनर-ए-बेवफ़ाई अच्छा था
वादों से मुकरना वाकई अच्छा था
आज ये सब कैसे
अरे बस ऐसे ही
तुझे तो मालूम है न मैं कैसा हूँ ,
शायद अब मैं बिल्कुल तेरे जैसा हूँ
मतलब पड़ने पर मैं तेरा हूँ
मतलब ख़त्म होने पर ज़माने जैसा हूँ
मैं ज़माने जैसा न बनता तो क्या करता
मैं तुझ सा नहीं बनता तो क्या करता
मैं कब तक तेरे लिए रोता रहता
मैं आख़िर कब तक गलियों में, कूचों में,
गाँव में, शहरों में, बाज़ारों में,
खुले मैदानों में ,
जंगलों में, चर्च में, गुरुद्वारों में
मस्जिदों में, मंदिरों में तुझे ढूँढ़ता रहता
मैं अपनी ज़िन्दगी तेरे लिए
क्यूँ बर्बाद करता
फिर ज़ेहन में आया कि
बदलना ही ठीक है
तेरे हर वादों को भूलना ही ठीक है
तेरी यादों को दिल से मिटाना ही ठीक है
ज़माना मतलबी , दुनिया मतलबी
हर शख़्स मतलबी
तू भी मतलबी
और अब मैं भी मतलबी

— Rovej sheikh

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