हर परिंदा हुनर कोई रखता
सर-ब-सर फिर जिगर कोई रखता
चाहते हैं सभी यहाँ उड़ना
हौसलों के ही पर कोई रखता
ज़िंदगी का सवाल जब हो तब
कौन किसकी ख़बर कोई रखता
अक़्ल से और होशियारी से
ख़ूब अच्छा असर कोई रखता
ख़ास बज़्म-ए-तरब रहे हैं तो
हुस्न पर भी नज़र कोई रखता
रोष से और चापलूसी से
ज़हर भी लफ़्ज़ पर कोई रखता
ख़ूब मुश्किल अगर रहे मंज़िल
रंज शाम-ओ-सहर कोई रखता
दोस्त ही बेवफ़ा 'मनोहर' हो
वास्ता फिर किधर कोई रखता
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