रात को ही चराग़ जलते हैं
चाँद तारें तभी निकलते हैं
दश्त में जब दरख़्त जलते तब
लोग फिर आँख ख़ूब मलते हैं
हौसलों से भरे परिंदे हैं
साथ उड़ते हुए निकलते हैं
दोस्त भी इत्तिफ़ाक़ से मिलते
दूर तक साथ साथ चलते हैं
रात भर जो कई दफ़ा जगते
बारहा आंँख फिर मसलते हैं
बंदगी शाम रंग से हो तो
हम उसी रंग में ही ढलते हैं
अस्ल में फ़ेहरिस्त का क्या है
नाम जब रोज़ सब बदलते हैं
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