इतरा न ख़ुशी पे न परेशाँ हो ग़मीं पे
होगा वही अंजाम लिखा है जो जबीं पे
देखा न किसी ने भी न जन्नत न जहन्नुम
हर एक हिसाब अम्र का देना है यहीं पे
शातिर हैं सियासत के ये सालार बहुत ही
रखते हैं नज़र और कहीं हद्फ़ कहीं पे
हिंदी की बहन हूँ मैं कोई ग़ैर नहीं हूँ
पैदा मैं हुई हिंद की इस पाक ज़मीं पे
इस हिंद की मिट्टी है मेरे ख़ून में शामिल
है जन्म यहीं का तो मरेंगे भी यहीं पे
क़ुर्बान भी गर होना पड़े होंगे वतन पर
तारीख़ शहादत की लिखी जाए हमीं पे
बैठे हैं फ़लक़ पे जो 'उमर' उन से है ये अर्ज़
थोड़ा तो करो रहम कभी ख़ाक-नशीं पे
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














