"क्या करूँँ मैं"
कौन सी मंजिल चुनूँ
कैसा सफ़र तय करूँ मैं
ऐ बेकरारी-ए-दिल बता
क्या करूँ मैं
स्याही के कोहरे सजाऊँ
या ख़ून का धुआँ करूँ मैं
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा
क्या करूँ मैं
मुझे न उस की हिजरत क़ुबूल है
न और से वस्ल में जा रहा हूँ
न दिल की ओर बढ़ रहा मैं
मैं न शक्ल पे जा रहा हूँ
मोहब्बतें बिखरी हैं ज़मीं पर
दिलों की ख़ाक उड़ रही है
अरे कैसा रस्ता है
मैं ये कहाँ जा रहा हूँ
किसे ख़ुदा मानूँ
किस की दुआ करूँ मैं
मुझे कोई तो बताए
आख़िर क्या करूँ मैं
नहीं पसंद ज़मीं मुझे
है आसमाँ पे दस्तरस नहीं
न किसी को मुझ पे है तरस
किसी पे मेरा बस नहीं
कहाँ चराग़ है मेरा
मेरा कहाँ पे जिन मिलेगा
इस के तो टुकड़े हो गए
नया कहाँ पे दिल मिलेगा
ख़ुद को कहाँ पे बाँधूँ
कहाँ से ख़ुद को रिहा करूँ मैं
ऐ ए'तिमाद-ए-दिल बता
क्या करूँ मैं















