किया घाइल मुझे मेरी मुहब्बत की अदा ने ही

सबा के साथ ग़द्दारी भी की ढलती सबा ने ही

कई तो ज़ख़्म थे नासूर पहले से हमारे तो
सभी चोटें हरी कर दी शराफ़त ने वफ़ा ने ही

भले थे हम अकेले थे अकेला ही मुक़द्दर था
दिलाया बेवजह साथी ख़ुदा सा ही ख़ुदा ने ही

बलाऍं थी मुझे लेनी किसी काफ़िर मसीहे की
वगरना मौत की ज़ाहिर सफ़र की हर घटा ने ही

कई आए गए माशूक़ महफ़िल में मगर 'कृष्णा'
तुझे देखा तुझे चाहा कसक ने ही क़ज़ा ने ही

— Krishna Mishra

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