दुनिया जब दीवानी होने लगती है
मुझ को तब हैरानी होने लगती है
दो दिन चलता है बाबू शोना जानू
बा'द में आना-कानी होने लगती है
मैं तू ये वो सब है ईमाँ वालें फिर
कैसे बे-ईमानी होने लगती है
झूठ पकड़ने का इक नुस्ख़ा है मेरा
आँखें बे-नूरानी होने लगती है
वज्ह क़ज़ा की "पानी" थी ये सुन कर के
नदियाँ पानी-पानी होने लगती है
बाहर के हर काम को कर लेता हूँ मैं
घर में तन-आसानी होने लगती है
— Nilesh Barai















